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नज़र का नींबू

नज़र का नींबू

“शनि जागे, काल क्रोध भागे .... शनि का दान – महाकल्याण

शनि का दान, महा-कल्याण"

आवाज़ इतनी बुलन्द थी कि दरवाजा सिहर उठा और घरवाले भी। सुमित्रा और उसकी दोनों बेटियाँ एक-दूसरे का मुँह ताक रहीं थीं।

मुसीबत में आदमी चेहरा उतरने से हारता नहीं। वो हारता तब है जब उसके हाथ-पैर हार जाते हैं।

"बाबा, खुले नहीं हैं।" सुमित्रा की आवाज़ रुंध गई थी।

"बेटा, नींबू-मिर्च बाँधा है। उसके तो दे दो।"

"पूछकर बाँधा करो न, बाबा।" कहकर सुमित्रा मंदिर खंगालने लगी। वही एक जगह थी जहाँ कोई सिक्का मिलने की उम्मीद थी।

लड्डू-गोपाल के आसन के नीचे दो-रूपये का सिक्का मिल गया। छुटकी जाकर शनि महाराज को थमा आई।

बड़की की शादी हुए एक महीना भी नहीं बीता था। पूरी शादी कर्ज़ लेकर की थी सुमित्रा और गोमुख ने।

सुमित्रा सिलाई करके थोड़ा बहुत कमाती थी। गोमुख की पन्द्रह-सौ रुपल्ली की सेल्समैन की नौकरी थी और बड़की एक स्कूल में पढ़ाकर पाँच-सौ रुपये लाती थी। खींचतान कर घर चलता था।

आनन-फानन में रिश्ता आया। चट मंगनी-पट ब्याह हो गया। अच्छा बड़ा भरा-पूरा घर था। दो बेटियाँ और थी बराबर की। ना करना समझदारी न होती।
 

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"रुक कर कौन सा कुबेर का खजाना मिलना है हमें, जो रुक जाएँ। कर-करा के नक्की करो। जो होगा देखा जाएगा।" सुमित्रा ने फरमान सुना दिया था। गरीब आदमी की बीवी जब थोड़ा बहुत कमाने लगती है तो आखिरी फैसला उसका ही होता है। गोमुख की हथेलियाँ पसीज गईं। माथे पर पसीने के मोती उग आए पर सुमित्रा की बात की काट नहीं मिली।

घर की आमदानी पाँच-सौ रुपये घट गई, जो बड़की लाती थी। गोमुख की पूरी तनख्वाह टेंट वाला ले गया। राशन तो बनिये से उधार आ गया पर साग-सब्जी के लिए पैसे नहीं थे। और आज तो घर में पूरी तरह सूखा था।

दोपहर में जीरे में छुंके पीले चावल खाकर माँ और दोनों बेटियाँ थोड़ा आराम कर रही थीं कि शनि महाराज ने आकर लड्डू-गोपाल को भी कंगाल कर दिया।

कुछ देर आँखें बंद कर लेटने से काम चलाऊ हिम्मत और उम्मीद संजो ली थी सुमित्रा ने। फिर वह बैठ गई अपनी मशीन पर।

आधा-घंटा भी नहीं बीता था कि दरवाजा फिर बजा। कर्ज सिर पर हो तो दरवाजे पर बेवक्त दस्तक कर्जदार को वैसे ही डरा देती है जैसे पुलिस से भागते छिप रहे किसी मुजरिम को।

घबराहट को भींचकर सुमित्रा खुद उठी।

कुन्डी सरका कर कपाट खींचे तो मुँह खुला रह गया। हथेलियाँ पसीज गईं। मन परेशान हो तो चेहरे पर विश्वास नहीं करना चाहिए | ऐसे में चेहरा विभीषण बन जाता है।

दरवाजे पर बड़की की जेठानी खड़ी थी। साथ में एक और महिला भी थी। होठों पर हँसी को ऐसे बुलाना पड़ा जैसे किसी शर्मीले को घोड़ी के आगे नाचने को लाना पड़ता है।

"पास रहती हो तो इसका मतलब यह थोड़ी ही है कि जब मन हुआ आ जाओगी," सुमित्रा मन ही मन उसे कोस रही थी, |"इससे अच्छा तो कोई कर्ज माँगने वाला ही आ जाता।" गरीबी की कुंठा पर अपमान का थूक जहर से भी ज्यादा घातक होता है।

"यहाँ से गुजर रहे थे, मौसीजी। सोचा, आपसे मिलते चलें।"

"अच्छा किया |" जेब खाली हो तो मन भी खाली हो जाता है। न खुशी की खनक, न मुस्कुराहट की खुशबू, बस कुंठा की तह होती है। जुबान का ज़ायका और मिज़ाज बिगड़ा-बिगड़ा रहता है।

घर का हाल-ऐ-दिल उसके बाशिंदों से अलेहदा नहीं होता | मेहमानों को बेतरतीब पड़े ड्राइंग-रूम में विराजमान कर सुमित्रा ने छुटकी को कनखियों से रसोई में जाने का इशारा किया |

"चाय मत बनइयो, गुड्डो | बहुत गर्मी है |"

"ऐसे कैसे? ब्याह के बाद पहली बार आई हो | बेटी की जेठानी पहली बार मुंह जूठा न करके जाए तो हमारे लिए तो मरने जैसा हो जाएगा," सुमित्रा ने ऐसे कहा जैसे शब्द किसी टेलीकॉलर में पहले से रिकॉर्ड हों | उसकी आँखें झिलमिला गईं थीं |

"बेटी की जेठानी भी तो बेटी होती है |" छुटकी कोने में खड़ी मुस्कुरा दी, "सब नाटक कर रहे हैं," मन में बोला उसने|

"पड़ोसन भी तो हो | तुमने बड़की को अपनी देवरानी बनवा लिया, इस ही बात की खातिरदारी करवा लो |" सुमित्रा के स्वर में तीन बेटियों की माँ वाली कृतज्ञता थी | "ठंडा मँगवाऊँ, कुछ?" सुमित्रा ने थूक निगलते हुए कहा |

"भरी दोपहरी में छोरियों को कहाँ भेजोगी, मौसी जी? शिकंजी बनवा लो, आप इतना कह रही हो तो |"

"ठीक है," सुमित्रा ऐसे मुस्कुराई जैसे किसी ने छाती पर छुरी रख कर मुस्कुराने के लिए कहा हो, " आप बैठो... मैं अभी आई," सुमित्रा उठ कर चली गई |

उसके जाते ही जेठानी ने अपनी सहेली की ओर देखा | आँखों में चमक बता रही थी कि उन्हें गरीबी के तमाशे का इंतज़ार था |

“कैसे होता है न, माँ- पैसा कमा लो या किसी की बेटी ब्याह लाओ तो काफी कुछ इंसेन्टिव में मिल जाता है जैसे इज्जत।" छुटकी बोली |

"वो इज्जत नहीं होती। उसे रुतबा कहते हैं.” सुमित्रा ने कहा |

"अरे, ये छोड़ो, शिकंजी कैसे बनेगी, वो सोचो," बिट्टो ने खीज कर कहा |

"अरे हाँ," सुमित्रा सिर पर हाथ रख कर सोचने लगी |

"शनि महाराज वाला नीम्बू ले आऊँ," बिट्टो धीरे से बोली |

छुटकी और सुमित्रा की आँखें चमक उठीं | "हाँ, जा जल्दी," सुमित्रा बिट्टो की पीठ थप थपा कर बोली, "छुटकी, तू चीनी घोल तब तक | मैं अंदर जाती हूँ, कहीं उठकर यहीं न आ जाए |"

दस मिनट बाद छुटकी दो गिलास शिकंजी और आलू के पापड़ मेज पर रख गई

सुमित्रा गिलास उठाकर मेहमानों को थमाने लगी. “आपका गिलास कहाँ है, मौसी जी?"

सुमित्रा को जेठानी की मीठी बातें ज़हर लग रहीं थीं.

“आप लो. मैंने अभी खाना खाया है."

"ऐसे तो नहीं चलेगा. शिकंजी तो खाना खाने के बाद भी पी जा सकती है,” कहते हुए जेठानी ने सहेली की तरफ देखा. उसने समर्थन में सिर हिलाया.

“गजब दोस्ती है," सुमित्रा ने सोचा, "ये मानेगी नहीं. इसे जल्दी चलता करने लिए कुछ तो करना पड़ेगा." वह खड़ी हुई.

"आप लो…मैं लाती हूँ."

गुड्डो और बिट्टो रसोई में खुसर-पुसर कर रहीं थीं, "हरा-सा नजर का नींबू था. दो गिलास बन गए गनीमत है. अब माँ के लिए कहाँ से बनाएँ?" छुटकी बोली|

सुमित्रा ने रसोई में पहुँच कर दो-घड़ी सोचा. फिर एक गिलास में पानी भरा और जाकर मेहमानों के सामने बैठ गई |

जेठानी और उसकी सहेली के चेहरे पर बेस्वाद शिकंजी के घूँट गटकने की पीड़ा सुमित्रा को उलहाने जैसी लग रही थी.

"ठीक नहीं बनी," सुमित्रा ने झेंपने का नाटक किया.

"कोई बात नहीं," जेठानी भी कम कुशल अभिनेत्री ना थी. स्वाद ना सही, देवरानी को दो बात सुनाने का मसाला तो मिला. "मीठी तो गुड्डो जैसी ही है, बस खट्टी कम है|”

सुमित्रा जानती थी कि जेठानी घर पहुँचते ही अपनी सास को फ़ोन करेगी और देवरानी के घर की पहली शिकंजी का स्वाद चटखारे ले-लेकर सुनाएगी | पर बेटी से बात करने के लिए उसके घर में फ़ोन नहीं था | ताने और उलहाने कितने मिले, ये जानने के लिए बेटी के पीहर आने का इंतज़ार करना था |

अगले शनिवार, शनि-महाराज ने नींबू बाँध कर आवाज़ लगाई – शनि जागे, काल क्रोध भागे .... शनि का दान –महा कल्याण |

सुमित्रा की मशीन के फट्टे पर दो का सिक्का पहले से तैयार था | वह ख़ुशी-ख़ुशी उठी, शनि महाराज की तेल भरी बाल्टी में सिक्का डाला और सिर ढंककर टीका लगवा लिया |

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